कल्पनापूरा संग्रह

रचना 526 / 789

मेरी तुम्हारी अपनी अपनी एक पूर्णता है जो एक दूजे के लिए अप्…

मेरी तुम्हारी अपनी अपनी एक पूर्णता है जो एक दूजे के लिए अप्राप्य है । वो जो पूर्णता में अप्राप्य है वही प्रेम है । हम दोनों एक शून्य यात्रा में है, जो व्योम तक जाती है और लौट कर फिर शून्य हो जाती है। कुछ ऐसा अप्राप्य हो तुम मेरे कुछ ऐसी मैं तुम्हारी पूर्णता। प्रेम भी कुछ कुछ ऐसा ही है।

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह