कल्पनापूरा संग्रह

रचना 528 / 789

प्रेम में मैंने तुम्हें बस प्रेम करने का हक़ दिया है।उदासी…

प्रेम में मैंने तुम्हें बस प्रेम करने का हक़ दिया है।उदासी से नवाजने का नहीं। दरख़्त को टूटती पत्ती ने टुकुर टुकुर देखते हुए कहा। फिर कुछ देर हवा में लहराकर मिट्टी पर पड़ गई । मिट्टी वाला मौसम याद है? पत्ती ने पहला संवाद दरख़्त की तरफ उछाल कर कहा। दरख़्त निर्मोही है। मुस्कुरा दिया। मैं झल्ली हूं। दूसरी बार टूट गई।

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