कल्पनापूरा संग्रह

रचना 531 / 789

प्रेम में पड़ी औरतें

प्रेम में पड़ी औरतें ...... खुले बंद केशों में आधी मूंदी आँखों वाली चिपके सिले अधर लिए टूटी फूटी लकीरों से सूखी गहरी बिवाइ पड़ी एक अधूरी अनसुनी मौन प्रार्थना भर हैं जिसमें.... दिशा देश दूरी देव दायरा देह सब नाम भर के शब्द हैं। गिरवी रखी सफ़ेद तितलियां हों जैसे..... पंखों में गीला नीला प्रेम पोते हुए

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह