कल्पनापूरा संग्रह

रचना 544 / 789

तुम्हारे साथ मैंने अथक यात्राएं की हैं l

तुम्हारे साथ मैंने अथक यात्राएं की हैं l आगे भी करूंगी l कभी मन की , कभी मन के विरुद्ध l इस विवशता को तुम जाने क्या कहो l मैं प्रेम ही कहूंगी। लौटना दुख देगा । इसलिए सहयात्री पर नहीं , यात्रा पर मन बांध दिया है। जिधर जाए संग मुझे ले जाए। *बरस बीत गया। बीता सो अच्छा ही रहा। २०२४ के कुछ अंतिम घंटे बचे हैं। नया बरस शुभ रहे।

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह