कल्पनापूरा संग्रह

रचना 552 / 789

बस इतना भर कि मुझे मांगना न पड़े

बस इतना भर कि मुझे मांगना न पड़े और उतना भर कि तुम देने से न चूको सम्मान समय सानिध्य स्मृति इन सब के बहुत बाद आता है प्रेम जो शाश्वत है। वही मेरा तुम्हारा है।

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह