कल्पनापूरा संग्रह

रचना 553 / 789

महा कुंभ

महा कुंभ.... स्त्री शीश के दो पाटों के बीच से निकलती हुई लाल। नैनों में पहुंचते ही पारदर्शी l फिर आँचल में सफ़ेद होकर भुजाओं और उंगलियों में गहरी नीली । उतरकर अंत में बची हुई देह में फिर रक्तवर्णा होती हुई गहरी नदी है। स्त्री गंगा है क्या ? या देह नामक स्थल ? शायद कुंभ है । हर मायने का कुंभ l महा कुंभ l

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