कल्पनापूरा संग्रह

रचना 622 / 789

उधारी के शब्दों से लिख ही नहीं सकते प्रेम

उधारी के शब्दों से लिख ही नहीं सकते प्रेम, अपनी शक्कर खुद घोलनी पड़ती है। *मेरे हिस्से के पागलपन में तुम्हारा स्वागत है । तुम भी ले आओ मेरे नाम की आवारगी l

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह