पांडेखोला अल्मोड़ा का मौण पालन केंद्र।
पांडेखोला अल्मोड़ा का मौण पालन केंद्र। एक सशक्त याद पिताजी पंचानब्बे बरस के हैं और कक्का यानि चाचाजी करीब तिरासी बरस के।दोनों भाइयों का अल्मोड़ा प्रेम अचूक है। उम्र के इस पड़ाव पर भी दोनों आज भी घर के ओने कोने के रखरखाव के बारे में सोचते रहते हैं। अभी इस समय दोनों छत पर रखे मौण के बक्सों के बारे में बात कर रहे। मौण माने मधुमक्खी। पिताजी बताते हैं कि एक समय हमारे घर में सौ क्विंटल शहद उत्पादन होता था। अब कोई घर में इसे नहीं करता।पर दोनों की बार बार की ज़िद्द के कारण एक बार फिर तीन बक्से छत पर रखे हुए हैं और मधुमक्खी उसमें घर बना चुकी हैं। शायद शहद और फल फूल की ही मिठास है कि अभी भी हमारा परिवार यहां अब तक सांझा है। हमारे रिश्ते मिठास और प्रेम से भरे हैं। हमारे घर में कमरे अलग अलग हैं पर मुख्य द्वार एक ही है। रसोई भी एक ही है। खाना एक साथ बनता है चाहे दो हों या बीस पच्चीस लोग। सोचती हूं कितनी गहरी जिजीविषा है पिताजी और कक्का में कि इतनी उम्र बीत जाने पर भी दोनों का घर से प्रेम बढ़ता ही जा रहा।दोनों पुरानी बातें,पुराने लोग,पुराने रीतिरिवाज,पुरानी कठिनाइयां, पुराना याराना याद करते हुए घंटों बातें करते वक्त बिता देते हैं। कितने सारे किस्से ताज़ा कर लेते हैं। इनको देखती हूं तो लगता है इस आधुनिक युग को ये दोनों जितना कम जानते हैं उतना ही बेहतर। ये मौलिकता, ये अपनापन बना रहे। आप दोनों का साया घर पर बना रहे। हम सब भाग्यशाली हैं।