कल्पनापूरा संग्रह

रचना 636 / 789

तुम्हारे मेरे बीच

तुम्हारे मेरे बीच एक ऊष्मा है जो जितनी शांत रहे उतनी अविरल रहेगी। नमक भरा समुद्र है प्रेम तरना तय है गर स्वाद भूल चुके हो तुम।