कल्पनापूरा संग्रह

रचना 576 / 789

एक रोज़ खूब दुःख गई

एक रोज़ खूब दुःख गई। फिर जब दुःख से उठी तो पहले सहूलियत की दीवार फांदी फिर डर की , उसके आगे बर्दाश्त की फिर सलाहियत की और आख़िर में आत्म की । सारी दीवारें पार कर अपने पंख फिर उगाए। मुस्कान समेटी। दुःख झाड़ा। अब पाखी हूं । कभी तितली भी। देखो अभी मल्लिका हूं। दिशा और दशा पर अपनी अंगुली रखती हूं। और अपना मन भी। दुःख अब मेरा दरबान है झांकता है झांकता रहे। आयेगा। आता रहे।